सृष्टि उत्पत्ति
ज्योतिष में एक सूर्यद्धांत नामक ग्रंथ है । जिसके अनुसार सृष्टि की आयु को 1000 महायुग में विभाजित किया गया है ।
ज्योतिष में एक सूर्यद्धांत नामक ग्रंथ है । जिसके अनुसार सृष्टि की आयु को 1000 महायुग में विभाजित किया गया है ।
1 सत्युग = 1728000 वर्ष
1 त्रेतायुग = 1296000 वर्ष
1 द्वापरयुग = 864000 वर्ष
1 कलियुग = 432000 वर्ष
इन चारों को मिलाकर बनता है एक महायुग जिसमें कुल वर्ष हैं 4320000 वर्ष ।
सृष्टि की आयु गीता, अथर्ववेद और सूर्यसिद्धान्त में है 1000 महायुग जिसे एक कल्प कहा जाता है ।
1 कल्प = 1 ब्रह्मदिन = 1000 महायुग = 1000 x 4320000 वर्ष = 4320000000 वर्ष
998 महायुग को विभाजित किया है 14 भागों में । जिनको मनु कहा जाता है ।
1 मनु = 71 महायुग = 71 × 4320000 वर्ष = 306720000 वर्ष
तो ऐसे अब तक 6 मनु पूरे बीत चुके हैं । और सातवें मनु का 28 वाँ महायुग का कलियुग का 5115 वाँ वर्ष चल रहा है ।
6 मनु = 6 x 306720000 वर्ष = 1840320000 वर्ष
27 महायुग = 27 x 4320000 वर्ष = 116640000 वर्ष
1 सत्युग = 1728000 वर्ष
1 त्रेतायुग = 1296000 वर्ष
1 द्वापरयुग = 864000 वर्ष
कलियुग के 5115 वर्ष
इनको जोड़कर हुआ है = 1960853115 वर्ष
1000 महायुगों में से जो पहले दो महायुग हैं उसमें पृथिवी ठंडी हुई है । बाद में मानव पृथिवी पर आया है ।
हिमालय पर्वत पर ज्ञान ईश्वर ने दिया है । क्योंकि तब हिमालय की ऊँचाई जल स्तर से कम थी और द्वीप डूबे हुए थे ।
समय के साथ साथ द्वीप ऊपर आते गए तो मानव हिमालय से प्रस्थान करता हुआ बाकी के भूखंड में बसने लगा और देश बसने लगे ।
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