Tuesday, 1 March 2016

अनमोल विचार
गुरू एक तेज हे जिनके आते ही सारे सन्शय के अंधकार खतम हो जाते है ।।
गुरू  वो मृदंग हे जिसके बजते ही अनाहद नाद सुनने शुरू हो जाते है ।।
गुरू  वो ज्ञान हे जिसके मिलते ही पांचो शरीर एक हो जाते है ।।
गुरू वो दीक्षा हे जो सही मायने मे मिलती हे तो पार हो जाते है ।।
गुरू वो नदी हे जो निरंतर हमारे प्राण से बहती है ।।
गुरू वो सत चित आनंद हे जो हमे हमारी पहचान देता है।।
गुरू  वो बासुरी हे जिसके बजते ही अंग अंग थीरक ने लगता है।।
गुरू वो अमृत हे जिसे पीके कोई कभी प्यासा नही ।।
गुरू वो मृदन्ग हे जिसे बजाते ही सोहम नाद की झलक मिलती है ।।
गुर वो कृपा हि हे जो सिर्फ कुछ सद शिष्यो को विशेष रूप मे मिलती हे और कुछ पाकर भी समझ नही पाते ।।
गुरू वो खजाना है जो अनमोल हे।।
गुरू वो समाधि है जो चिरकाल तक रहती है।।
गुरू वो प्रसाद है जिसके भाग्य में हो उसे कभी कुछ मांगने की ज़रूरत नहीं।।

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