Tuesday, 23 February 2016

मालिस करना भी है  एक कला


मॉडर्न युग में हम मालिस का अर्थ स्पा से ही लगाने लगे हैं जबकि बचपन में मैं और मेरे पिताजी छत पर धुप में जा कर एक दुसरे की मालिस किया करते थे।
पूरे शरीर की मालिस स्वयं ही करनी चाहिए, बस पीठ की मालिस किसी और से ही कराई जानी चाहिए।
अब मैं आपको बताऊंगा कि मालिस किस अंग की कैसे और किस तेल से की जानी चाहिए। 
तेल का काम मुख्य तौर पर स्मूद हाथ चलने के लिए ही होता है और साथ ही रोमकूपों में चमड़ी में प्रवेश कर खुश्की दूर करने भर का होता है।
तेल में फूलों की सुगंध, आयुर्वेदिक जड़ी- बूंटी डाल कर उसे मेडिकेटेड बनाया जाता है और तेल की वैल्यू एड करता है और जो कि किसी ख़ास बीमारी के उपचार के लिए उपयुक्त है. अन्यथा मालिस के लिए सरसों का तेल बेस्ट है।
सिर की चम्पी के लिए नारियल तेल, उसमें ब्राम्ही-आंवला-भृंगराज आदि जड़ी डाल कर की गयी मालिस करने से बेहद लाभ होता है।
घुटनों के दर्द के लिए तिल के तेल की मालिस की जानी चाहिए. छोटे बच्चों और औरतों को जैतून का तेल बेहतर है।
दर्द से राहत के लिए सरसों के तेल में लहसुन उबाल कर मालिस करनी चाहिए।
सर की गरमी शांत करने के लिए देशी घी की मालिस अच्छी है।
सूर्य की किरणों से रचाया तेल भारी लाभदायक होता है।
शिरो धारा द्वारा भी कई उपचार किये जाते हैं।
मालिस के कुछ देर बाद गुनगुने पानी से नहाना चाहिए।


प्रत्येक अंग की मालिस कैसे करें,
यह एक महीना मालिस के लिए सर्वोत्तम है पूरे साल नीरोगी और एक्टिव रहने के लिए  सुबह की कुनकुनी धुप में कम से कम कपड़ों में लेट कर मालिस करने से आपकी नस-नाड़ी और मांस-पेसियां सबल होती है, रक्त संचार बढ़ता है, रोम कूप खुल जाते हैं, पुराने कोष झड जाती है सारे विजातीय द्रव्य बाहर निकल जाते हैं।
मालिस करने से भूख भी खुल कर लगती है, पूरे शरीर में प्रसन्नता की लहर दौड़ने लगती है।
सूर्य की किरणों विटामिन डी का सर्वोत्तम स्त्रोत है।
इसके पश्चात गुनगुने जल से शरीर रगड़ते हुए स्नान करने के बाद पूरा शरीर और दिमाग खुल जाता है
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